Tuesday, June 19, 2012

कल जब बारिश हुई थी

कल जब बारिश हुई थी......
बहुत सुहाना हो गया था मौसम......

काले बादलों ने तपते सूरज को ढक लिया था,
और एक मद्धम सी रौशनी के साथ
हर तरफ अपनी छाया फैला दी थी....

जैसे ही नन्ही-नन्ही बूंदों ने आँगन को भिगोना शुरू किया....
तभी एक सौंधी सी खुशबू सभी तरफ फ़ैल गई...
और प्रकृति के सोंदर्य का अहसास करवा दिया.....

कुछ ही देर में बारिश तेज हुई और बड़ी-बड़ी बूंदों ने,
जमीन पर इकठ्ठा होकर बहना शुरू कर दिया.....
जिसे जिस तरफ ढलान मिली वो बह चलीं.......

रिमझिम-रिमझिम बारिश धीरे-धीरे कम होने लगी थी....
और बादल भी सूरज को आजाद कर रहे थे अपनी गति से...
तभी एक तरफ नजर आया एक....... इन्द्रधनुष..........

जो सभी सात रंग लिए था अपने में....
और हमें सीख दे रहा था हल हाल में साथ रहने की..........मोहनिश......!!

Sunday, June 17, 2012

जब भी मौसम बहार का आता है

जब ये मौसम बहार लाता है....
हर तरफ खुशी और प्यार लाता है....

बहुत दिनों तक रहता है इंतजार इसका,
पर जब इसे आना होता है ये तभी आता है....

कभी रिमझिम-रिमझिम बारिश....
तो ये कभी इन्द्रधनुष दिखता है....

ये मोहक, सुन्दर रूप प्रकृति का...
सभी के मन को लुभाता है........

कहीं नदियाँ तो कहीं झरने,
तो ये कहीं बादलों में छुपा सूरज दिखता है....

जब भी मौसम बहार का आता है,
हर तरफ खुशी और प्यार लाता है........मोहनिश....!!

Wednesday, June 13, 2012

पर्वत

दूर तक देखने पर
कहीं एक तरफ नजर आते हैं पर्वत......!

विशाल ह्रदय से जैसे बुला रहें हों,
लगता है अभी हाँथ बढ़ा कर छु लूँ इन्हें.......!

मेरे अपने से लगते है कभी-कभी ये पर्वत,
जो एक अजीब सी ख़ामोशी लिए बैठे है.....
जैसे इंतजार कर रहें हो मेरे पहले बोलने का......

वो चाहते है की मैं उनपर विश्वास करूँ,
और चढ जाऊ उनपर......तब वे मुझे धकेल दें फिर से नीचे.....
और अहसास करवा दें ...

यही की कोई अपना नहीं है इस दुनिया में......
सभी पराये........दूर हैं....
और ढोंग रचाये बैठे है.....अपने होने का.............मोहनिश......!!

निराशा का एक शान्त समुन्दर

निराशा का एक शान्त समुन्दर,
हमारी आँखों में सदा ही दबा रहता है....!

जब कभी हताशा की लहरें आती है,
तब ये शांत सा दिखने वाला समुन्दर,
बन जाता है सुनामी......!

तब हर तरह की उम्मीद और साहस,
सभी एक-एक करके दम तोड़ने लगतें है......!

और वहाँ कोई फरिश्ता भी मदद को नहीं आता,
सभी खुद को बचाने में जुटे नजर आते है.......!

Saturday, May 26, 2012

रेशम में लिपटी जिंदगी

जिंदगी हर बार कैद ही रही,
फिर भी कभी रुकी नहीं, कहीं थमी नहीं......

रेशम में लिपटी हुई,
डाल के सहारे लटकती रही.....

जिससे दामन दुनिया अपना,
हर बार झटकती रही........

फिर आई बरी उसकी,
अब आया समय बदल जाने का,

फूलों सा खिल कर,
वन-वन मंडराने का.........!!!!

पेंडो का बंधन

रात जैसे-जैसे गहरी हुई, और अँधेरा हुआ सभी तरफ,
तभी पेंड तेज हवाओं का सहारा लेते हुए
कुछ इस तरह से सरसराने लगे मानो बातें कर रहें हो...आपस में.....

वे पेंड कई सालों से खड़े है अपनी जगह पर,
लगता है वे अब ऊब चुके है इस तरह खड़े-खड़े.......

तेज हवा का बहाना बना कर वो हर बार कोशिश करते है,
अपने स्थान को बदलने की....पर ये जड़ें........

ये जड़ें उन्हें उखड़ने नहीं देतीं,
ये पेंड को अपना गुलाम बनाये हुए हैं.....कई सालों से....

हल्की सी रौशनी में दिखाई पड़ता है....
मानो सभी पेंड आपस में भाग जाने की,
कोई योजना बना रहें हो....और फिर सहमति में अपना भी सर हिला रहे हों.....

पर मुश्किल से ही कोई पेंड इस बंधन से आजाद हो पाता है,
और अगर हो भी जाता है तो मारा जाता है....
समाप्त कर दिया जाता है......प्रकृति के द्वारा.....

आजादी किसे प्यारी नहीं है, पर मौत तो कोई आजादी नहीं.......
ये सब मायाजाल है इन तेज चलती हवाओं का....
जो पेंडो के मन में बगावत का बीज बो देती है......

मैं ऐसी हवाओं का विरोध करता हूँ.............................मोहनिश.........!!!

Saturday, May 12, 2012

जन्नत आती है नजर

उस पार कभी कभी,
मुझे जन्नत आती है नजर.....

चंचल हवाओं से जहाँ है बने घर,
और बादलों में सिमटा पूरा शहर.....

सुनहरी रौशनी के सहारे देखता है कोई,
जैसे, कभी मुझे तो कभी मेरा घर......

हर तरफ खुशबुओं का मोसम है,
उसे महसूस करूँ तो कहाँ, देखूं तो किधर....

मन तो करता है छु लूँ उसको हाँथ बढ़ा कर,
पर टूट न जाए ये सपना, लगता है इसका डर......मोहनिश.....!!!